रविवार, 23 अप्रैल 2017

कवि #कानदानजी_चारण 'कल्पित' की अमर रचना --

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डब-डब भरिया, बाईसा रा नैण ,
चिड़कली रा नैण,लाडलडी़ रा नैण,
तीतरपंखी रा नैण,सूवटडी़ रा नैण,
दो’रो घणो सासरियो॥

मायड़ जाण कळेजै री कोर,फ़ूल माथै पांख्यां धरी।
माथै कर-कर पलकां री छांय,पाळ-पोस मोटी करी॥
राखी नैणां री पुतळी जाण,मोतीडा़ सूं महंगी करी।
कर-कर आघ,लडाई घण लाड,
भरीजी मन गाढ,
जीवण मीठो ज़हर पियो,
दो’रो घणो सासरियो॥

डूबी सोच समंदडै़ रै बीच,तरंगा में उळझ परी।
जाणै मोत्यां बिचली लाल,पल्लै बंधी खुल परी।
भरियो नैणां ममता-नीर,लाडलडी़ नै गोद भरी।
जागी-जागी कळैजै री पीड़,
हिय सूं लीवी भीड़,
गरळ-गळ हिवडो़ भरियो,
दो’रो घणो सासरियो॥

भाभीसा काढ काजळियै री रेख,संवारी हिंगळू मांगड़ली।
बीरोसा लाया सदा सुरंगो बेस,ओढाई बोरंग चूंदड़ली।
बाबोसा फ़ेरियो माथै पर हाथ,दिराई बाई नै सीखड़ली।
ऊभो-ऊभो साथणियां रो साथ,
आंसूडा़ भीज्यो गात,
नैणां झड़ ओसरियो,
दो’रो घणो सासरियो॥

करती कळझळ हिवडै़ रा दो टूक,कूंकूं पगल्या आगै धरिया ।
कायर हिरणी-सी मुड़-मुड़ देख ,आंख्यां माथै हाथ धरिया ।
मुखडो़ मुरझायो बिछडंतां आज ,रो-रो नैण राता करिया ।
चांद-मुखडै़ उदासी री रेख,
डुसक्यां भरती देख,
सहेल्यां गायो मोरियो,
दो’रो घणो सासरियो॥

रथडै़ चढती पाछल फ़ोर,सहेल्यां नै झालो दियो।
कूंकूं-छाई बाजर हरियै खेत,जाणै जियां झोलो बियो|
छळक्या नैण घूंघटियै री ओट,काळजो काढ लियो।
काळी-काळी काजळियै री रेख,
मगसी पड़गी देख,
नैणां सूं ढळक्यो काजळियो,
दो’रो घणो सासरियो॥

मनण-रूठण रा आणंद उछाव,हियै रै परदै मंडता गिया।
सारा बाळपणै रा चित्राम,नैणां आगै ढळता गिया।
बिलखी मावड़ नै मुड़ती देख, विकल नैण झरता गिया।
करती निस-दिन हंस-किलोळ,
बाबोसा-घर री पोळ,
ढ्ल्या रो रमणो छूट गियो,
दो’रो घणो सासरियो॥

लागी बालपणै री प्रीत,जातोडी जीवडो़ दो’रो कियो।
रेसम रासां नै दी फ़णकार,सागडी़ नै रथडो़ खड़यो।
धरती अम्बर रेखा रै बीच,सोवन सूरज डूब गियो।
दीख्या-दीख्या सासरियै रा रूंख,
रेतड़ली रा टूंक,
सौ कोसां रहग्यो पीवरियो,
दो’रो घणो सासरियो॥

डब-डब भरिया, बाईसा रा नैण,
चिड़कली रा नैण,लाडलडी़ रा नैण,
तीतरपंखी रा नैण,कोयलडी़ रा नैण,
सूवटडी़ रा नैण,दो’रो घणो सासरियो॥

रविवार, 8 जनवरी 2017

मोबाइल री कथा

*राजस्थानी भाषा में एक व्यंगात्मक*
                   हास्य कविता

कलयुग में भगवान एक, ''खिलौनों बणायो।
दुनियावाला ई को नाम मोबाइल रखवायो।

मोबाइल रखवायो,खिलोणो अजबअनोखो।
धरती क इन्साना न यो,लाग्यो घणो चोखो।।

इन्सानासुं भगवनबोल्या,बात राखज्यो याद।
सोचसमझ वापरो, वरना होज्यासो बर्बाद।।

होज्यासो बर्बाद,चस्को लागेलो अति भारी।
ई के लारे पागल हो जावेली दुनिया सारी।।

सदउपयोग करेजो कोई,काम घणोयो आसी।
दुर्पयोगजे होवण लाग्यो,टाबर बिगड़जासी।।

टाबर बिगड़ जासी,कोई की भी नहीं सुणेला।
'मोबाइल' में मगन रहसी,काम नहीं करेला।।

टाबरांकी छोड़ो,बडोड़ा की अक्कल जासी।
कामधंधा छोड़ बैठ्या मोबाइल मचकासी।

मोबाइलमचकासी और खेलसी दिनभरगेम।
व्हाट्सएप रे मैसेज मे ही,बीत जासी टेम।।

छोरियां और लुगायां लेसी इंटरनेट कनेक्शन।
हाथांमें मोबाइल रखणो बणजावेलो फ़ैसन।।

बण जावेलो फ़ैसन,ए तो फेसबुक चलासी।
रामायण और भगवतगीता पढणो भूलजासी

अपणेअपणे मोबाइल मे,रहसी सगळा मस्त।
धर्मकर्म और रिश्तानाता,सबहो जासी ध्वस्त।

हे ! प्रभु थारी आ लीला है घणी अपरम्पार
थें म्हानेबतावो, यो थांरो किस्यो है अवतार'।।

सोमवार, 2 जनवरी 2017

अै लिछमी दीप बुझाती जा!

अै लिछमी दीप बुझाती जा!


ओढ्यां जा चीर गरीबां रा
धनिकां रौ हियौ रिझाती जा
चूंदड़ी रौ अेक झपेटौ दै, अै लिछमी दीप बुझाती जा !
हळ बीज्यौ सींच्यौ लोई सूं तिल तिल करसौ छीज्यौ हौ
ऊंनै बळबळतै तावड़ियै, कळकळतौ ऊभौ सीझ्यौ हौ
कुण जांणै कितरा दुख झेल्या, मर खपनै कीनी रखवाळी
कांटां-भुट्टां में दिन काढ्या, फूलां ज्यूं लिछमी नै पाळी
पण बणठण चढगी गढ-कोटां, नखराळी छिण में छोड साथ
जद पूछ्यौ कारण जावण रौ, हंस मारी बैरण अेक लात
अधमरियां प्रांण मती तड़फा, सूळी पर सेज चढाती जा
चूंदड़ी रौ अेक झपेटौ दै,
अै लिछमी दीप बुझाती जा !

जे घड़ी विधाता रूपाळी, सिणगार दियौ है मजदूरां
रखड़ी बाजूबंद तीमणियौ, गळहार दियौ है मजदूरां
लोई में बोटी बांट-बांट, जिण मेंहदी हाथ लगाई ही
फूलां ज्यूं कंवळा टाबरिया, चरणां में भेंट चढाई ही
घर री बू-बेट्यां बिलखी, पण लिछमी तनै सजाई ही
इक थारी जोत जगावण नै, घर-घर री जोत बुझाई ही
पण अैन दिवाळी रै दिन बैरण, सांम्ही छाती पग धरती
ठुमकै सूं चढी हवेली में, मन मरजी रा मटका करती
जे लाज बेचणी तेवड़ली, तो पूरौ मोल चुकाती जा
चूंदड़ी रौ अेक झपेटौ दै,
अै लिछमी दीप बुझाती जा !

इतरा दिन ठगती रैई है, थूं भोळी बण छळ जाती ही
खाती ही रोटी मांटी री, पण गीत वीरै रा गाती ही
जे हमें जांण रौ नांम लियौ, तौ जीभ डांम दी जावैला
जे निजर उठी मैलां कानीं, तौ आंख फोड़ दी जावैला
जे हाथ उठायौ हाकै नै, नागोरी गहणौ जड़ दांला
जे पग धर दीनां सेठां घर, तौ पगां पांगळी कर दांला
महलां गढ़ कोटां बंगळां रा, वे सपना हमें भुलाती जा
चूंदड़ी रौ अेक झपेटौ दै,
अै लिछमी दीप बुझाती जा !